गोदनी एक प्राचीन इतिहास

गोदनी

लेखक -प्रदीप उइके

गोदनी

संकलन कर्ता -प्रदीप उइके

मध्य प्रदेश का इतिहास(History of Madhya Pradesh)


मध्यप्रदेश भारत के केंद्र में स्थित है इसलिए मध्य प्रदेश को भारत का हृदय प्रदेश भी कहा जाता है हिमालय से भी पुराना है वह किसी समय वह संरचना का हिस्सा था जिसे गोंडवानालैंड कहा गया है,

फिल्म जंगल सत्याग्रह के सीन के लिए जब मुंबई कि टीम रोहित घोक्षे, प्रवीण डी के साथ गोंडवाना प्रोडक्शन टीम प्रदीप उइके एवं इंजी राजा धुर्वे, गुरुवेश वाड़ीवा एवं साथियो के साथ चल पड़े तो सतपुड़ा टाइगर रिजेर्व फारेस्ट मे हजारों सालो से गोंडी गोदनी प्राचीन पत्थरो पर ऊकेरी मिली, उस धरोहर को पुरातत्व विभाग संरक्षित नहीं कर पाया ये दुःखद है, गोंड कोरकू समुदाय बाहुल्य क्षेत्र मे इस तरह धरोहर होना एवं फिर महिलाओ के शरीर पर उकेरना यहाँ के अनादि काल के निवास का प्रमाण देता है, गोंड कोरकू आदिवासी परिवार से ताल्लुक रखता है


मध्यप्रदेश के इतिहास को मुख्यता 4 भागों में विभाजित किया गया है

1. प्रागैतिहासिक काल

2. प्राचीन काल

3.मध्य काल

4.आधुनिक काल


1. प्रोगैतिहासिक काल :-

प्रागैतिहासिक शब्द प्राग+इतिहास से मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है- इतिहास से पूर्व का युग। हजारों वर्ष पूर्व मानव गुफाओं मे रहता था तथा जानवरों का शिकार कर अपनी भूख मिटाता था। इन्ही गुफाओं की दिवारों पर आदि मानव ने अपने कला कौशल का परिचय कुरेद कर या फिर रेखाआ से सहजता के साथ अकिंत कर दिया था जो आज हमे हमारे पूर्वजों के जीवन की वास्तविकताओं से परिचित करवाता है।

मध्यप्रदेश मे किए गए उत्खनन और खोजो मे प्रागैतिहासिक काल सभ्यता के चिन्ह मिले हैं,आदिम प्रजाति नदियों के किनारे और गुफाओं में रहती थी !

मध्यप्रदेश के भोपाल. रायसेन .धनेरा .नेमावर .मोजावाडी .महेश्वर .देवगांव बरखेड़ा . सिंघनपुर. आजमगढ़ .पचमढ़ी. होशंगाबाद .मंदसौर तथा सागर के अनेक स्थानों पर इनके रहने के प्रमाण मिले हैं ! इस काल के मानव ने अपनी कलात्मक अभिरुचियों की भी अभिव्यक्ति की है!



होशंगाबाद के निकट गुफाओं के निकट गोंडी गोदनी की कंदराओं तथा भोपाल के भीमबेटीका एवं सागर के निकट पहाड़ियों से प्राप्त शैलचित्र इसके प्रमाण हैं

प्रागैतिहास (Prehistory) इतिहास के उस काल को कहा जाता है जब मानव तो अस्तित्व में थे लेकिन जब लिखाई का आविष्कार न होने से उस काल का कोई लिखित वर्णन नहीं है।



[1] मानव प्रागितिहास, पत्थर के उपकरण का उपयोग 3.3 मिलियन साल पहले होमिनिन्स और लेखन प्रणालियों के आविष्कार के बीच की अवधि है। सबसे पहले लेखन प्रणाली 5,300 साल पहले दिखाई दी थी, लेकिन लेखन को व्यापक रूप से अपनाया जाने में हजारों साल लग गए, और 19 वीं शताब्दी तक या वर्तमान तक भी कुछ मानव संस्कृतियों में इसका उपयोग नहीं किया गया था। मेसोपोटामिया में सुमेर, सिंधु घाटी सभ्यता और प्राचीन मिस्र अपनी खुद की लिपियों को विकसित करने और ऐतिहासिक रिकॉर्ड रखने वाली पहली सभ्यताएं थीं; यह शुरुआती कांस्य युग के दौरान पहले से ही था। इस काल में मानव-इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाएँ हुई जिनमें हिमयुग, मानवों का अफ़्रीका से निकलकर अन्य स्थानों में विस्तार, आग पर स्वामित्व पाना, कृषि का आविष्कार, कुत्तों व अन्य जानवरों का पालतू बनना इत्यादि शामिल हैं। ऐसी चीज़ों के केवल चिह्न ही मिलते हैं, जैसे कि पत्थरों के प्राचीन औज़ार, पुराने मानव पड़ावों का अवशेष और गुफाओं की कला। पहिये का आविष्कार भी इस काल में हो चुका था जो प्रथम वैज्ञानिक आविष्कार था। प्रागैतिहासिक काल में मानवों का वातावरण बहुत भिन्न था। अक्सर मानव छोटे क़बीलों में रहते थे और उन्हें जंगली जानवरों से जूझते हुए शिकारी-फ़रमर जीवन व्यतीत करना पड़ता था। विश्व की अधिकतर जगहें अपनी प्राकृतिक स्थिति में थीं।



[2] ऐसे कई जानवर थे जो आधुनिक दुनिया में नहीं मिलते, जैसे कि मैमथ और बालदार गैंडा।

[3] विश्व के कुछ हिस्सों में आधुनिक मानवों से अलग भी कुछ मानव जातियाँ थीं जो अब विलुप्त हो चुकी हैं, जैसे कि यूरोप और मध्य एशिया में रहने वाले निअंडरथल मानव। अनुवांशिकी अनुसन्धान से पता चला है कि भारतीयों-समेत सभी ग़ैर-अफ़्रीकी मानव कुछ हद तक इन्ही निअंडरथलों की संतान हैं, यानि आधुनिक मानवों और निअंडरथलों ने आपस में बच्चे पैदा किये थे।



[4] वह काल जिसकी जानकारी के लिए लिखित साधन का अभाव है तथा जिसमें मानव असभ्य जीवन जी रहा था उसे प्रागैतिहासिक काल की संज्ञा दी गयी है। इस काल का कोई लिखित विवरण नहीं है। इस काल के विषय की जानकारी पाषाण (Stone) उपकरणों तथा मिट्टी के | बर्तनों व खिलौनों से प्राप्त होती है।


वह काल जिसकी जानकारी के स्रोत के रूप में लिखित साधन उपलब्ध है तथा जिसमें मानव सभ्य हो चुका था, को ऐतिहासिक काल की संज्ञा दी गयी है।


वह काल जिसकी जानकारी के स्रोत के रूप में लिखित साधन उपलब्ध तो है, परन्तु उसकी | लिपि को पढ़ने में अभी तक कोई इतिहासकार सफल नहीं हो पाया है, को प्राक् या पुरा या आद्य इतिहास (Proto History) कहा जाता है। हड़प्पा संस्कृति एवं वैदिक कालीन सभ्यता को आद्य इतिहास के अन्तर्गत रखा गया है।

 

प्रागैतिहासिक काल को दो कालों में विभाजित किया गया है !

1.पाषाण काल

2.ताम्र पाषाण काल


 

1. पाषाण काल

मध्यप्रदेश में पाषाण काल के स्थल नर्मदा घाटी चंबल घाटी बेतवा घाटी सोनार घाटी भीमबेटिका की गुफा आदमी पाए गए हैं तथा 2000 ईसवी पूर्व नर्मदा की सुरय म घाटी में सभ्यता विकसित हुई!

इस काल के औजार बनावट अथवा लकड़ी के बेत वाले हस्त कुठार के अतिरिक्त खुरचनी .मुफ्ती कुठार तथा क्रोड मध्य प्रदेश के विभिन्न स्थानों में पाए गए हैं!

मृदभांड बनाना , झोपड़ी बनाकर रहना ,वस्त्रों का प्रयोग करना , मनुष्य ने उत्तरपाषण काल में सीख लिया था !

उत्तर पाषाण काल को लघू औजार पाषाण काल भी कहते हैं !

नवपाषाण काल में मानव ने कृषि करना सीख लिया था

मानव पशु पक्षी तथा मछली को भोजन में प्रयोग करता था !

 

पाषाण काल के प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल एवं विशेषताएं

पचमढ़ी क्षेत्र:- (महादेव हिल्स, मध्य प्रदेश)

केंद्र: बाजार गुफा, निंबबुभूज, महादेव, मंडदेव, दोरोथी द्वीप, इम्ली खोह और बनिया बेरी।

प्रसिद्ध पेंटिंग: पुरुषों-महिलाओं द्वारा सामूहिक हथियार या बुमेरांग युक्त सामूहिक शिकार; रोज़मर्रा की जिंदगी के दृश्यों में नृत्य, गायन, मवेशियों की चराई आदि का चित्रण दर्शाया गया है।



चंबल :- बेतवा, चंबल नर्मदा इत्यादि घाटी उसे बहुतायात औजार प्राप्त हुए हैं !नवपाषाण युग मध्य प्रदेश में लगभग 7000 ईसवी पूर्व में प्रारंभ हुआ यहां से सेल्ट कुल्हाड़ी बसूला रजक घन जैसे औजार मिलें है ! मनुष्य ने इसी काल में कृषि पशुपालन गृह निर्माण और अग्नि  जैसे क्रांतिकारी कार्यों को आपनाया है !

ऐरण ,गढी मोरेला,जतकरा , बाहुलई, बुसिगा  मुंनई , जबलपुर , दमोह , नंदगाव , होशन्गबाद , इस युग के साथ प्राप्त करते हैं!

आजमगढ़:- यह मध्य पाषाण कालीन है यह होशंगाबाद के निकट नर्मदा तट पर स्थित है आजमगढ़ प्रागैतिहासिक मानव की क्रीड़ा स्थली रहा है गुफा शैल चित्र यहां की प्रमुख विशेषता है!

 भीमबेटका :- प्रागैतिहासिक मानव की कलात्मक अभिव्यक्ति के साथ चिन्ह विंध्य पर्वतों में स्थित भीमबेटका के से प्राप्त हुए हैं भीमबेटका में ऊंचे ऊंचे पत्थर के टीले के मध्य गुफाए निर्मित है!

 

2. ताम्र पाषाण काल

मध्यप्रदेश में बालाघाट एवं जबलपुर जिले के कुछ भागों में ताम्र कालीन औजार मिले हैं ! इनके अध्ययन से ज्ञात होता है कि वह समय देश के अन्य क्षेत्रों के समीप मध्य प्रदेश के कई भागों में इस सभ्यता का विकास हुआ !

यह मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के समकालीन थे !

मानव ने पत्थर के साथ तांबे का प्रयोग सीखा!

नर्मदा चंबल बेतवा नदी के किनारे और जबलपुर बालाघाट में इस सभ्यता का विकास हुआ!

मालवा के कायथा एरण .आवरा . नवदाटोली. डाँगवाला. बैसनगर से इस सभ्यता के प्रमाण मिले हैं!

 डॉक्टर बी श्री वाकण कर ने नागदा काय था की खोज की!

 इस काल में पशुओं में गाय कुत्ता बकरी पाले जाते थे!

घुमक्कड़ जीवन समाप्त. खेती, पशुपालन प्रारंभ हो गया था!

 


ताम्र पाषाण काल के प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल एवं उनकी विशेषताएं

कायथा :-यह पहली ताम्रपाषाण बस्ती थी जिसका अस्तित्व 1380 से पूर्व तक रहा कायदा वराह मिहिर की जन्मभूमि थी!

 एरण :- यह सागर जिले में स्थित है इसका प्राचीन नाम ऐरिकिण था इस ताम्र वस्थी का समय 2000 ईसवी पूर्व से 700 ईसवी पूर्व माना जाता है जहां से तांबे की कुल्हाड़ियां सोने के गोल टुकड़े चित्र मृदभांड ताम्र कालीन बस्ती के प्रमाण आदि प्राप्त हुए !

नवदाटोली :-  यह महेश्वर में नर्मदा तट पर स्थित है इसका ताम्रपाषाण एक अस्तित्व 1637 ई.पूर्व के मध्य माना जाता है यहां से झोपड़ीनुमा मिट्टी के घरों के साक्ष्य मिले हैं जो चौकोर या आयताकार होते थे !

आवरा:- मंदसौर जिले में स्थित आगरा ग्राम से ताम्रपाषाण से लेकर गुप्त काल तक की विभिन्न अवस्थाएं एवं संबंधित सामग्री मिली है !

डांगवाला :-  यह उज्जैन से 32 किलोमीटर दूर बस्ती में स्थित है यह गत शताब्दी के उत्खनन से अस्तित्व में आई !

नागदा:-  यह उज्जैन जिले में चंबल नदी के तट पर है इसताम्रपाषाण बस्ती से भी मृदभांड और लघु पाषान  के अस्त्र आदि मिले हैं!


खेड़ीनामा :- यह होशंगाबाद जिले में स्थित है 1500 पूर्व पुरानी ताम्रपाषाण बस्ती

2.  मध्य प्रदेश का प्राचीन इतिहास

प्राचीन काल का इतिहास वेदिक युग  1500 से 1600 ईसवी पूर्व के आसपास से शुरू होता है मिट्टी के बर्तन चित्रित धूसर मृदभांड जो उत्तर में लौह युग के संकेत माने जाते हैं इनका मध्यप्रदेश में आभाव था इस प्रकार मध्य प्रदेश का इतिहास ताम्रपाषाण के बाद लोहयुग से शुरू होता है

दक्षिण भारत के कुछ स्थलों से प्राप्त विशाल पासवान समाज में को महापाषाण स्मारक मेघालय कहा जाता है मध्य प्रदेश के सिवनी और रीवा जिले में ऐसे स्मारक  ऊत्खनित किये गये है!



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